शर्मिंदगी का एहसास

हम चाह कर भी आपका दीदार  न कर पाए ,
इस आलसी  तन  ने मेरे मन  को बहुत दुःख  पहुंचाए  |

चाहत तो हुस्न- ए-  शबाब  रूबरू  की थी,
पर  ज़माने के तनाज़े ने मुहे आजमाए |

टिप्पणियाँ

  1. sir mere taraf se bhi ek
    Tittle- क्या तुम्हें याद है?
    वो बचपन की बातें,
    वो बचपन की रातें।
    वो पढ़ाई की शुरुआत,
    वो दोस्तों से मुलाकात।
    जो अभी तक मेरे दिल में आबाद है,
    क्या तुम्हें याद है- क्या तुम्हें याद है।।
    वो विषयों की सारे किताबों से दूरी,
    वो गणित के सारे हिसाबों से दूरी ।
    वो गुरु के सवालों जवाबों से दूरी,
    बचपने का वह एक अंदाज है,
    क्या तुम्हें------------याद हैं।।
    फिर उसी बचपने वास्ते डांट खाना,
    अम्मी बोले अब्बू से चमाट लगाना,
    पानी इसको घाट के घाट पिलाना।
    अब्बू बोले जरा तुम खाट बिछाना,
    कह सैफ जो तेरे मन के हालात है।
    क्या तुम्हें---------------याद है? ।।
    ( सैफुर्रज़ा मोहम्मद तव्वाब शेख)

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

एहसास