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शर्मिंदगी का एहसास

हम चाह कर भी आपका दीदार  न कर पाए , इस आलसी  तन  ने मेरे मन  को बहुत दुःख  पहुंचाए  | चाहत तो हुस्न- ए-  शबाब  रूबरू  की थी, पर  ज़माने के तनाज़े ने मुहे आजमाए |