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मार्च, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अच्छा लगा

बादलोँ सा काफ़िला आता हुआ अच्छा लगा, प्यासी धरती को हर सावन अच्छा लगा| वह कहाँ आता तवस्सुम-ए-लहरोँ के साथ, अदाओँ भरा हुस्ने-ए-जलवा दिखाना अच्छा लगा| मदहोशी महफ़िल मे उसका चँद लम्होँ के लिए, निशाँ के नीले आँचल मे गेशू घुमाना अच्छा लगा| पहले पहले तो निगाहोँ मे कोई जँचता न था, रफ़्ता रफ़्ता दूसरा फिर तीसरा अच्छा लगा|

बड़ा कवि-

अउरिउ कवी सब आँधर हुवैँ , हमका यक्कै अँखियक बनाऊ रे माई| गणपति अइसन नाक कान मोरा हुवै, बरगद अइसन पेट फुलाऊ रे माई | इनका भाँटा कै पेँड़ बनाकै हमै, मोटका यू. के. लिप्टिस बनाऊ रे माई| आँधी भूकम्प जहाँ से चलै वहीँ दर्रा हुवै तौ बिठाऊ रे माई| अउरिउ कवी सब बगुला हुवैँ, हमका बड़ा हंस बनाउ रे माई| आशा औ लता से पातर बोली , मोरे कंठ का अइसन सजाऊ रे माई | दस गड्डी नोटि हमै कहिया मिली , अइसन ऊँचा मंच बताऊ रे माई| चाहे जवन बस बड़ा हुवै बैँक, वही मँइहा खाता खोलाऊ रे माई|

मेरे बड़े भईया

पग-पग पे दिखाते ज्योति भाव सब ग्रंथ सिखाते हैं, सचमुच मेरे भईया मुझको मंत्र बताते हैं | बोझ नही बनते अपना, मेरा भी बोझ उठाते हैं, लेते नही किसी का कुछ भी प्यार दिखाते हैं, गुरु -वशिष्ठ, द्रोणाचार्य से लगते जड्तंत्र सँवारते हैं, सचमुच मेरे-------|| तल्लीन ही रहते मेरे पढने के सामान सँजोने मे, रखते हमे साथ अपने सोने के हिंडोले मे, निरबानी को सब-बानी बनाते गुरु-मंत्र दिलाते हैँ, सचमुच मेरे भइया मुझको मंत्र बताते हैँ||