अच्छा लगा

बादलोँ सा काफ़िला आता हुआ अच्छा लगा,
प्यासी धरती को हर सावन अच्छा लगा|

वह कहाँ आता तवस्सुम-ए-लहरोँ के साथ,
अदाओँ भरा हुस्ने-ए-जलवा दिखाना अच्छा लगा|

मदहोशी महफ़िल मे उसका चँद लम्होँ के लिए,
निशाँ के नीले आँचल मे गेशू घुमाना अच्छा लगा|

पहले पहले तो निगाहोँ मे कोई जँचता न था,
रफ़्ता रफ़्ता दूसरा फिर तीसरा अच्छा लगा|

टिप्पणियाँ

  1. मदहोशी महफ़िल मे उसका चँद लम्होँ के लिए,
    निशाँ के नीले आँचल मे गेशू घुमाना अच्छा लगा|
    .....................बहुत खूब बहुत खूब /

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद पाण्डेय जी

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