आँनंद मंगल दायिनी हो, प्रतिबिम्ब सी बियो विदारति आव , मंजुल पैजनिया झनकारति काव्य सुधारश भारति आव , झंकृत यंत्र के तंत्रियोँ से जड़ता पे मंत्र सी मारति आव , प्रेम प्रचारति हंस विहारति भारति वीणा संवारति आव | देती तंत्र नाद, झूम झंकृत अम्बर के , बिदिग दिगम्बर के ब्याकरण बोलहि , ज्योति मेति अन्वय मे , साहित्य समन्वय मे,ब्यायी अनुयायी तोँहि निरन्यय कलोलहिँ , दात्र-शक्ति, राष्ट्र-शक्ति , धात्र-सम्बिधात्र शक्ति , ब्रम्हा विष्णु शँकरहु शीश के हिँडोलहि , निरबानी सब बानी , दानि हो बखानि तोहि ,ईशदानी बानी की अशीष पटतोलहि | सूर, तुलसी जैसी कहानियोँ को देके तुहिँ ,कुल गुण तुहिँ भाषा शैलियाँ सिखाती हो , निपट निराला को बनाकर निराला तोहि ,कवि वर्मा को पूरा ईश्वर बनाती हो , अनल अनंत ईश तुम पे असम्भव का , संवृत्त कानन कंज-कुँज विकसाती हो , वज्र मूर्ख हूँ ,कालिदास सा बनाय हमै , सुकवि बनइबू कहाँ भूलि-भूलि जाती हो|